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I Met Me...!!
....Spontaneous Natural and True....
Tuesday, June 10, 2025
पीढ़ा
Friday, May 9, 2025
शम्भू
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A recitation of the same has been captured with a calming music.
Click on the link to check it out: Shambhu
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मैं हूँ उद्गम,
मैं हूँ आकाश,
मै हूँ पाताल,
है शक्ति मेरी अर्धांगिनी,
मुझ से जुड़े जल, धारा, नभ, अग्नि ।
मेरे अंदर से रचयिता जन्मा,
कहते उसे विष्णु - ब्रह्मा ।
मेरा निवास, मेरा कैलाश
मैं हूँ अधिपति योग - साधना
मेरे ध्यान से खुलती है रचना ।
गजमुख पुत्र गणेश विघ्नहर्ता,
बुद्धि के दीप जलाएं हर पथता
कान्तिवान कार्तिक वीर मेरा बच्चा,
शत्रु-दलों का संहार करे जो सच्चा ।
है नंदी मेरा परम भक्त,
सच्ची भक्ति यत्र तत्र सर्वत्र ।
रावण भी है मेरा पुजारी,
वीणा के तारों पर गाता त्रिपुरारी,
शिवा तांडव के मंत्रों से भरपूर,
मेरी स्तुति में उसका हर मस्तक चूर,
जब मन हुआ तो नाच उठूँ,
तांडव मस्ती में झूम उठूँ ।
मैं भस्म हूँ मैं गंगा,
त्रिनेत्र जलाए जब खुल जाए,
त्रैलोक्य काँपें दिशाएँ सिहर जाए ।
ना आदि मेरा, ना अंत कोई,
मैं शिवा हूँ, मैं सत्य स्वरूप,
मैं शम्भू, मैं शम्भू, मैं शम्भू …
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Monday, October 21, 2024
तुम हुस्न पारी, तुम जाने जहाँ ... पर माफ़ करना ।
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ऐसा नहीं है की ख़ूबसूरती में कुछ कमी है,
हो तुम भी एक हुस्न पारी,
आँखें ऐसी जैसे गहरी झीलें,
पर हमको बस हमारे किनारो की तलब है
इन आँखों में डूब न सकेंगे, माफ़ करना।
मुस्कान ऐसी जो समां कर दे रंगीन ,
पर हम बस अब अपने काले-सुफैद में खुश है,
इस मुस्कान पर मर-मिट न सकेंगे, माफ़ करना।
बातें ऐसी जिनसे पहरों गुज़र जाये,
पर हम बस १०-१५ मिनट के BREAK लिया करते है,
इन बातों को सुन न सकेंगे, माफ़ करना।
घनेरे गेसू, लेहरायें ऐसे जैसे खुशनुमा फ़िज़ा, हों भीगे तो देते ताज़गी का मज़ा,
और हमारे तो उजड़े चमानों की चर्चायें होती है
इन ज़ुल्फ़ों में खो न सकेंगें, माफ़ करना।
तो ऐसा बिलकुल नहीं है की आप एक मंज़िल नहीं है
ये तो बस हम है के इन रास्तों पे चल न सकेंगे, माफ़ करना।
Wednesday, October 16, 2024
कुछ देखा है मैंने
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कुछ देखा है मैंने
अपने कल सा लगता है
मेरे हाथों की बानी चाय है
और तुम्हारी मद्धम सी मुस्कान
गालिबों और गुलज़ारों की किताबें है हाथ में मेरे
और तुम्हारी फलसफों सी बातों की दूकान
पहरों के हिसाब वाला बहीखाता गुम सा गया है
मानो मिट सी गयी हो थकान
एक बाग़ीचा भी है
४ - ५ बमूरे की क्यारियां, गुलाब भी है
नीम का पेड़ और बीचों बीच तुलसी का पौधा
बड़ा सुहाना है उम्र का ये मकाम
बेफिक्री तो नहीं है पर हाँ सुकून सा महसूस होता है
दो वक़्त की रोटी भी है
उम्मीदें छोटी सी है
चार लफ़्ज़ों में करते है बयान
सोचता हु काफी दूर तो आगये है,
जब चले थे बस एक तुम्हारा दिल था,
एक आखर जुबां पे था,
डेढ़ संझो के जेब में रखा था,
हाँ कुछ शुबों और शिखवो को कही भूल आये है
बस पूंजी के ब्याज पर होते है धुंआ
कुछ महफिलों सा माहोल भी दीखता है,
साकी के साथ रूह है, रूहदारी भी,
४ - ५ दोस्त है, उनकी किलकारी भी
वही अपना पूरा कारवां
अच्छा सुनो ...
जो दिखाया है देख पायी हो क्या
जो समझाया है समझ पायी हो क्या
नहीं ?
कोई बात नहीं !
लो ये चाय, अपने हाथों से बनायीं है
बदले में मुझे क्या चाहिए?
बस, तुम्हारी मद्धम सी मुस्कान।
Thursday, February 1, 2024
बाज़ार लगा है...
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Once I completed writing this and read it for the first time, it gave me vibes of
a Nukkad-Natak. Try to read it in that tone, hopefully you will enjoy it.
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बाज़ार लगा है क्या बेचते हो -
कुछ ने कहा,
रोटी है, गोल गोल, गरम गरम,
खुद को तपा के पेट की ताप मिटाती है, श्रम मांगती है
मोल दो ले जाओ,
खुद खाओ, औरो को खिलाओ |
बाज़ार लगा है क्या बेचते हो -
कुछ ने कहा,
कला है, अद्भुत, मर्मस्पर्शी,
साधना मांगती है,
मोल दो ले जाओ,
खुद निहारो, बखान बघारो |
बाज़ार लगा है क्या बेचते हो -
कुछ ने कहा,
ज़मीर है, ज़रूरतें भरा, मजबूरी भरा,
लालच बढ़ाता है, फायदे करता है,
मोल दो ले जाओ,
और हाँ सो सको तो सो जाओ |
बाज़ार लगा है क्या बेचते हो -
कुछ ने कहा,
देह है, मखमल से भी, कर्कश से भी,
कुछ व्यापारियों के दिए है, कुछ खुशी ने दिए है,
ज्यादातर लाचारी ले कर आयी है,
आज की भूक-प्यास मिट जाएगी पर कल फिर लौट आएगी,
मोल दो ले जाओ,
खा-पी लो, कल फिर आना नहीं तो ये भूखे मर जायेंगे|
बाज़ार लगा है क्या बेचते हो -
कुछ ने कहा,
बुद्धि है, विशाल, अपार, शक्तिशाली,
तप मांगती है, संसार दिलाती है,
मोल दो ले जाओ,
खूब बाटना पर संभाल के रखना कही अहम् चुरा न ले|
बाज़ार लगा है पर ये क्या है जो बिक नहीं रहा -
उस ने कहा,
विवेक है,
सबको लगता है की बिकाऊ है पर कोई मोल नहीं पाता,
बस कुछ गिने चुने आते है और साथ ले जाते है|
सब ख़तम हो गया?
अरे पर बाज़ार तो अभी भी लगा है,
हाँ क्युकी ये अभी यही है, ये बिकना नहीं चाहते,
क्या है ये ?
मूर्खता, निःस्वार्थता, पागलपन और इनकी अगुआ "यारी",
जहां जाती है, तीनो को साथ ले जाती है,
बाज़ार को देखती है और खूब मज़ाक उड़ाती है,
आनंद उठाना हो तो इन चारो पे पीछे बैठ जाओ,
और नहीं तो बाकी सब तो है ही,
मोल दो और ले जाओ|
Thursday, December 7, 2023
अच्छा सुनो
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This is a small Monologue conversation between two people who are in Love
with each other, but have now been separated due to some circumstances.
The girl first gives her concerning departing message and then the guy replies.
Tried the Free Verse for the first time. Hope I did a bit of justice to it.
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अच्छा सुनो .. अगर मैं चली गयी तो क्या तुम मुझे याद करोगे?
शायद तुम अपनी ज़िन्दगी में इतना व्यस्त होंगे तो मुझे याद करने का समय न निकल पाओ
अच्छा सुनो .. खुद के लिए तो समय निकल ही लेना
सूखे मेवे रात को भिगो तो लेते हो पर खाना भूल जाते हो
अच्छा सुनो .. खेल भी लिया करना अपने दोस्तों के साथ फूटबाल ऑफिस के बाद,
समय थोड़ा बच जाता होगा मुझे घर जो नहीं छोड़ने जाते,
और हाँ चोट मत लगा लेना खेलने में
अच्छा सुनो .. शर्ट ही पेहेना करो थोड़ा MATURE लगते हो,
कब तक टी-शर्ट पेहेनते रहोगे
अच्छा सुनो .. हेलमेट पहने की भी आदत डाल लो,
कही बाल बचने के चक्कर में कुछ गलत न हो जाये
अच्छा सुनो .. समय निकल सको तो थोड़ा ही सही,
पर याद जरूर कर लेना मुझे, लगेगा इस बेनाम रिश्ते का दर्ज़ा बड़ा है
अच्छा सुनो .. एक बात तो बोलना भूल ही गयी
अपना ध्यान रखना
चलती हूँ
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अच्छा सुनो .. जा ही रही हो तो
थोड़ा तुम्हारा सामन रखा है, लेती जाओ
एक बस्ता है मेरा, शायद भरी लगेगा, उठा लेना
ज़माने की ज़िम्मेदारी जो उठाने लगी हो, आदत हो गयी होगी
कुछ धुंदले धुंधले से लम्हे हैं,
आँखें उस दिन की याद नहीं बस गालों पे पड़ती तुम्हारी लटे याद हैं
आँखें तो उस दिन की याद है जब पहली बार मिली थी
और काजल की सियाही मनो रास्ता दिखा रही हो नयी रोशनियों का
पहली मुलाकात से याद आया एक प्याला भी है चाय का,
ऐसे घूरो मत, तुम्हारा ही है, तुम्हारे होठों के निशान है उसपे
नीले दुपट्टे वाली पीली पीली २-४ लटकने है,
हाँ काली बिंदीया भी होगी देख लेना
कुछ छोटे छोटे पत्थर होंगे, जो तालाब के किनारे से उठाये थे तुमने
बातें करते करते तालाब भरना चाहती थी तुम शायद
वैसे भूला नहीं हूँ तुम्हारी उन् बातों को , देखो शर्ट भी पेहेन राखी है
पता रहता तुम आरही हो तो कत्थई वाली पेहेन लेता
एक किताब है मेरी, वो वापस देदेना, मेरी FAVORITE है
उसमें से अपने दिए फूल लेलेना, सूख गए है पर बिखरे नहीं
एक कलम भी है, जिसका ढक्कन चबा-चबा के तुमने ही ख़राब किया है
उसी से लिखे होंगे तुमने ये सरे वादों भरे खत
इन् खतों को भी ले जाओ, शायद सरे मुझे ज़ुबानी हो गए है
दो-तीन तस्वीरें है तुम्हारी वैसे तो मेरी मेज़ के कांच के नीचे
पर अब्ब तुम्हे शायद चाहिए होंगी, देखने आने वालो की भेजनी होंगी
पर वो काले सूट वाली ही भेजना, कान के झुमके भी दिख रहे है उसमें
सबसे अच्छी वो हो लगती है
१२८ दफा ज़माने से छुप-छुप कर मिले है इन् ४ सालो में
१२७ दफा ले जाओ
१ पहली बार वाला मिलना में रख लेता हूँ, क्युकी वो बस मेरा है
वैसे सही तो कह रही हो व्यस्त तो बहुत हूँ
वो तो बस यही इन् सब चीज़ो को संझो रखा है
ऐसा भी नहीं है के हर हफ्ते इस बास्ते को निकालता हूँ, अपने आप निकल आता है
जब चौपाटी से गुज़रता हूँ
जब शनिवार को मंदिर जाता हूँ
जब बगीचे की bench पर सर रखने को किसी का कन्धा नहीं होता
जब फिल्म देखते समय पकड़ने को किसी का हाथ नहीं होता
जब रात .. बहराल
लेजाओ सब लेजाओ .. मेरा बस्ता भी
सोच रही होगी ये सब तुम्हे वापस क्यों दे रहा हूँ
क्युकी काफी बदल ने की कोशिश कर ली पर अभी भी थोड़ी लापरवाही है मुझमें
डरता हूँ इतना कीमती सामान कही खो न दू
और अच्छा सुनो .. तुम भी अपना ध्यान रखना
Thursday, September 28, 2023
|| ... तू है, तो बता ... ||
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तू है तो बता, दे पता
घर का नहीं, तो मोहल्ले का
फिर इंतज़ार कर, हल्ले का
जो मैं करूँगा, हाँ हर्ज़ाना भी भरूंगा।
तू है तो बता, दे पता...
मैं तो हूँ ही, तेरी भी होगी बदनामी
मेरी भी बहुत हुई, और बस कर तेरी भी मनमानी
मनमानी महंगी पड़ती है, मत भूल
मैं ने नहीं बनाया, तेरा ही है ये उसूल।
तो तू है तो बता, दे पता...
रात बहुत हो चुकी है तमाशा मत बना
मेरी आँखों को निराशा मत दिखा
आपस के गीले है दूर कर लेंगे
ताना-कसाई, तू-तू मैं-मैं, भरपूर करलेंगे।
इसीलिए पूछ रहा हूँ, तू है तो बता, दे पता...
दो दिन हुए, आसमान दिया था
फिर पर काट दिए, मैं उड़ ही तो रहा था
उड़ने से दिक्कत है तो बोल, कम उडूंगा
पंख इस्तेमाल कैसे करते है, पहले ये पढूंगा।
तो तू है तो बता, दे पता...
माना मुझे आता नहीं दिया लगाना, माथा टेकना
और पता नहीं कहाँ से सीखा मैंने ऐसे दुनिया देखना
नया कुछ सीखेंगे और बदलेंगे रवैया भी
शायद तभी ठीक से चलेगा जीवन का पहिया भी।
इन सब में समय लगेगा इसीलिए तू है तो बता, दे पता...
चल माना तू नहीं है, तो कोई और होगा, उसका पता दे
और वो नहीं तो कोई और होगा, वो बता दे
और अगर फिर भी कोई नहीं, तो क्या बस मैं हूँ
बड़ा उलट-फेर हो जायेगा गर बस मैं हूँ।
बोल...तू है तो बता, दे पता...
Wednesday, May 31, 2023
The Oldest Game [A small Retelling from The Sandman by Neil Gaiman]
Sunday, May 14, 2023
Mother's Day / मातृत्व दिवस
There is an entity of supreme power; The creator. He takes care of everything, his plans are well set, we mere mortals are only following what he has set for us. There are certain things that he also needs help in. One such thing is being a mother.
Hi I am Ketan, and as I was the birthing partner to my wife, last week I witnessed her giving birth to my little one. I was stunned and was in complete disbelief of whatever was happening. She not just acted as a portal to bring my baby into this world but also she managed to do all the things with such ease. The entire process is so powerful that it gave birth to two individuals, one Kashi as my daughter and second Shreya was born as a mother.
Studies have already proved that the magnitude of pain during birth and labor is of highest degree a human being can experience, but there was a time when she was so composed and calm that all the pain we talk about was practically non there. She was Durga in her full glory, she was Kali in her crude form, she was Saraswati in her own calming self. My perspective has broaden and deepened towards looking at a mother. All the filmy and bookish definitions of mother seems very less.
It has been a week now and today we realised that it is her first Mother’s Day and all due to respect to all the mothers in this entire world, I bow my head in gratitude to thank you for all the selfless love and care you shower upon us, I join my hand in humbleness to pray to the divinity you are and I hold my ears in sorry if any of my actions have troubled you in any sense.
I also take this opportunity to announce the arrival of another Durga, Kali, and Saraswati in making, our Beautiful Little Daughter… Kashi
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हिन्दी संस्करण
सर्वोच्च शक्ति की एक इकाई है; निर्माता। वह हर चीज का ख्याल रखता है, उसकी योजनाएँ अच्छी तरह से निर्धारित होती हैं, हम केवल नश्वर उसका अनुसरण कर रहे हैं जो उसने हमारे लिए निर्धारित किया है। कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनमें उन्हें मदद की भी जरूरत होती है। ऐसी ही एक चीज है मां बनना।
प्रणाम, मैं केतन हूं, और चूंकि मैं अपनी पत्नी का जन्म साथी था, पिछले हफ्ते मैंने उसे अपने बच्चे को जन्म देते हुए देखा। मैं स्तब्ध था और जो कुछ भी हो रहा था उस पर मुझे पूरा विश्वास नहीं हो रहा था। उसने न केवल मेरे बच्चे को इस दुनिया में लाने के लिए एक पोर्टल के रूप में काम किया बल्कि वह सभी चीजों को इतनी आसानी से करने में कामयाब रही। पूरी प्रक्रिया इतनी शक्तिशाली है कि इसने दो व्यक्तियों को जन्म दिया, एक काशी मेरी बेटी के रूप में और दूसरी श्रेया ने एक माँ के रूप में जन्म लिया।
अध्ययनों ने पहले ही साबित कर दिया है कि जन्म और श्रम के दौरान दर्द की भयावहता उच्चतम स्तर की होती है जिसे मनुष्य अनुभव कर सकता है, लेकिन एक समय था जब वह इतनी शांत थी कि हम जिस दर्द के बारे में बात करते हैं वह व्यावहारिक रूप से अस्तित्वहीन था। वह अपनी पूर्ण महिमा में दुर्गा थी, वह अपने कच्चे रूप में काली थी, वह अपने आप में सरस्वती थी। मां को देखने के प्रति मेरा नजरिया व्यापक और गहरा हो गया है। मां की सभी फिल्मी और किताबी परिभाषाएं बहुत कम लगती हैं।
अब एक हफ्ता हो गया है और आज हमने महसूस किया कि यह उनका पहला मदर्स डे है और इस पूरी दुनिया में सभी माताओं के सम्मान के कारण, मैं आपके सभी निस्वार्थ प्यार और देखभाल के लिए धन्यवाद देने के लिए अपना सिर झुकाता हूं। मैं नम्रता से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि आप देवत्व हैं और अगर मेरे किसी भी कार्य ने आपको किसी भी तरह से परेशान किया है तो मुझे खेद है।
मैं इस अवसर पर एक और दुर्गा, काली और सरस्वती के आने की घोषणा करने का भी लाभ उठाता हूं, हमारी सुंदर छोटी बेटी ... काशी।