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This is a small Monologue conversation between two people who are in Love
with each other, but have now been separated due to some circumstances.
The girl first gives her concerning departing message and then the guy replies.
Tried the Free Verse for the first time. Hope I did a bit of justice to it.
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अच्छा सुनो .. अगर मैं चली गयी तो क्या तुम मुझे याद करोगे?
शायद तुम अपनी ज़िन्दगी में इतना व्यस्त होंगे तो मुझे याद करने का समय न निकल पाओ
अच्छा सुनो .. खुद के लिए तो समय निकल ही लेना
सूखे मेवे रात को भिगो तो लेते हो पर खाना भूल जाते हो
अच्छा सुनो .. खेल भी लिया करना अपने दोस्तों के साथ फूटबाल ऑफिस के बाद,
समय थोड़ा बच जाता होगा मुझे घर जो नहीं छोड़ने जाते,
और हाँ चोट मत लगा लेना खेलने में
अच्छा सुनो .. शर्ट ही पेहेना करो थोड़ा MATURE लगते हो,
कब तक टी-शर्ट पेहेनते रहोगे
अच्छा सुनो .. हेलमेट पहने की भी आदत डाल लो,
कही बाल बचने के चक्कर में कुछ गलत न हो जाये
अच्छा सुनो .. समय निकल सको तो थोड़ा ही सही,
पर याद जरूर कर लेना मुझे, लगेगा इस बेनाम रिश्ते का दर्ज़ा बड़ा है
अच्छा सुनो .. एक बात तो बोलना भूल ही गयी
अपना ध्यान रखना
चलती हूँ
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अच्छा सुनो .. जा ही रही हो तो
थोड़ा तुम्हारा सामन रखा है, लेती जाओ
एक बस्ता है मेरा, शायद भरी लगेगा, उठा लेना
ज़माने की ज़िम्मेदारी जो उठाने लगी हो, आदत हो गयी होगी
कुछ धुंदले धुंधले से लम्हे हैं,
आँखें उस दिन की याद नहीं बस गालों पे पड़ती तुम्हारी लटे याद हैं
आँखें तो उस दिन की याद है जब पहली बार मिली थी
और काजल की सियाही मनो रास्ता दिखा रही हो नयी रोशनियों का
पहली मुलाकात से याद आया एक प्याला भी है चाय का,
ऐसे घूरो मत, तुम्हारा ही है, तुम्हारे होठों के निशान है उसपे
नीले दुपट्टे वाली पीली पीली २-४ लटकने है,
हाँ काली बिंदीया भी होगी देख लेना
कुछ छोटे छोटे पत्थर होंगे, जो तालाब के किनारे से उठाये थे तुमने
बातें करते करते तालाब भरना चाहती थी तुम शायद
वैसे भूला नहीं हूँ तुम्हारी उन् बातों को , देखो शर्ट भी पेहेन राखी है
पता रहता तुम आरही हो तो कत्थई वाली पेहेन लेता
एक किताब है मेरी, वो वापस देदेना, मेरी FAVORITE है
उसमें से अपने दिए फूल लेलेना, सूख गए है पर बिखरे नहीं
एक कलम भी है, जिसका ढक्कन चबा-चबा के तुमने ही ख़राब किया है
उसी से लिखे होंगे तुमने ये सरे वादों भरे खत
इन् खतों को भी ले जाओ, शायद सरे मुझे ज़ुबानी हो गए है
दो-तीन तस्वीरें है तुम्हारी वैसे तो मेरी मेज़ के कांच के नीचे
पर अब्ब तुम्हे शायद चाहिए होंगी, देखने आने वालो की भेजनी होंगी
पर वो काले सूट वाली ही भेजना, कान के झुमके भी दिख रहे है उसमें
सबसे अच्छी वो हो लगती है
१२८ दफा ज़माने से छुप-छुप कर मिले है इन् ४ सालो में
१२७ दफा ले जाओ
१ पहली बार वाला मिलना में रख लेता हूँ, क्युकी वो बस मेरा है
वैसे सही तो कह रही हो व्यस्त तो बहुत हूँ
वो तो बस यही इन् सब चीज़ो को संझो रखा है
ऐसा भी नहीं है के हर हफ्ते इस बास्ते को निकालता हूँ, अपने आप निकल आता है
जब चौपाटी से गुज़रता हूँ
जब शनिवार को मंदिर जाता हूँ
जब बगीचे की bench पर सर रखने को किसी का कन्धा नहीं होता
जब फिल्म देखते समय पकड़ने को किसी का हाथ नहीं होता
जब रात .. बहराल
लेजाओ सब लेजाओ .. मेरा बस्ता भी
सोच रही होगी ये सब तुम्हे वापस क्यों दे रहा हूँ
क्युकी काफी बदल ने की कोशिश कर ली पर अभी भी थोड़ी लापरवाही है मुझमें
डरता हूँ इतना कीमती सामान कही खो न दू
और अच्छा सुनो .. तुम भी अपना ध्यान रखना