••••••••••••••••••••••••••••••••
हम थे यही
तुम थे यही
कुछ जाम चले
कुछ नाम चले
किस्से निकले
ग़ुस्से निकले
हवाएँ गम की
आँखें नम थी
कुछ बात हुई
कुछ नहीं
फिर आई मुस्कान
और आई थोड़ी हसी
गीलों का दौर आया
शिकायतें लाया
तनहाइयाँ थी
फिर दुहाइयाँ थी
तेज़ वाली हूँक थी
रोज़ों वाली भूक थी
इरादे बदले
और वादे बदले
शाम गई
पर रात नहीं
फिर सिसकियों वाली चुप्पी आई
और आधी वाली नींद भी आई
सुबह दूर है
पर मजबूर हैं
हो खत्म अभी
घर जाएँ सभी
पहले सब समझा लिया करते थे
माथे की नस दुखा लिया करते थे
बुते में अब वो बात नहीं
रही जवां अब रात नहीं
गर होता मन मैला
तो ना होता ये खेला
थक हार जब गले लगे
नेक सारे विचार और भले लगे
अब कुंठा कल की हुई
और पीढ़ा हल्की हुई
••••••••••••••••••••••••••••••••