Monday, October 21, 2024

तुम हुस्न पारी, तुम जाने जहाँ ... पर माफ़ करना ।

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ऐसा नहीं है की ख़ूबसूरती में कुछ कमी है,

हो तुम भी एक हुस्न पारी,

आँखें ऐसी जैसे गहरी झीलें,

पर हमको बस हमारे किनारो की तलब है 

इन आँखों में डूब न सकेंगे, माफ़ करना। 


मुस्कान ऐसी जो समां कर दे रंगीन , 

पर हम बस अब अपने काले-सुफैद में खुश है,

इस मुस्कान पर मर-मिट न सकेंगे, माफ़ करना। 


बातें ऐसी जिनसे पहरों गुज़र जाये,

पर हम बस १०-१५ मिनट के BREAK लिया करते है, 

इन बातों को सुन न सकेंगे, माफ़ करना। 


घनेरे गेसू, लेहरायें ऐसे जैसे खुशनुमा फ़िज़ा, हों भीगे तो देते ताज़गी का मज़ा, 

और हमारे तो उजड़े चमानों की चर्चायें होती है 

इन ज़ुल्फ़ों में खो न सकेंगें, माफ़ करना। 


तो ऐसा बिलकुल नहीं है की आप एक मंज़िल नहीं है 

ये तो बस हम है के इन रास्तों पे चल न सकेंगे, माफ़ करना। 

Wednesday, October 16, 2024

कुछ देखा है मैंने

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कुछ देखा है मैंने 

अपने कल सा लगता है 

मेरे हाथों की बानी चाय है 

और तुम्हारी मद्धम सी मुस्कान


गालिबों और गुलज़ारों की किताबें है हाथ में मेरे 

और तुम्हारी फलसफों सी बातों की दूकान


पहरों के हिसाब वाला बहीखाता गुम सा गया है  

मानो मिट सी गयी हो थकान 


एक बाग़ीचा भी है 

४ - ५ बमूरे की क्यारियां, गुलाब भी है 

नीम का पेड़ और बीचों बीच तुलसी का पौधा 

बड़ा सुहाना है उम्र का ये मकाम 


बेफिक्री तो नहीं है पर हाँ सुकून सा महसूस होता है 

दो वक़्त की रोटी भी है 

उम्मीदें छोटी सी है 

चार लफ़्ज़ों में करते है बयान


सोचता हु काफी दूर तो आगये है, 

जब चले थे बस एक तुम्हारा दिल था, 

एक आखर जुबां पे था, 

डेढ़ संझो के जेब में रखा था,

हाँ कुछ शुबों और शिखवो को कही भूल आये है 

बस  पूंजी के ब्याज पर होते है धुंआ


कुछ महफिलों सा माहोल भी दीखता है, 

साकी के साथ रूह है, रूहदारी भी, 

४ - ५ दोस्त है, उनकी किलकारी भी 

वही अपना पूरा कारवां 


अच्छा सुनो ...


जो दिखाया है देख पायी हो क्या 

जो समझाया है समझ पायी हो क्या 

नहीं ?

कोई बात नहीं !

लो ये चाय, अपने हाथों से बनायीं है 

बदले में मुझे क्या चाहिए?

बस, तुम्हारी मद्धम सी मुस्कान।