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कुछ देखा है मैंने
अपने कल सा लगता है
मेरे हाथों की बानी चाय है
और तुम्हारी मद्धम सी मुस्कान
गालिबों और गुलज़ारों की किताबें है हाथ में मेरे
और तुम्हारी फलसफों सी बातों की दूकान
पहरों के हिसाब वाला बहीखाता गुम सा गया है
मानो मिट सी गयी हो थकान
एक बाग़ीचा भी है
४ - ५ बमूरे की क्यारियां, गुलाब भी है
नीम का पेड़ और बीचों बीच तुलसी का पौधा
बड़ा सुहाना है उम्र का ये मकाम
बेफिक्री तो नहीं है पर हाँ सुकून सा महसूस होता है
दो वक़्त की रोटी भी है
उम्मीदें छोटी सी है
चार लफ़्ज़ों में करते है बयान
सोचता हु काफी दूर तो आगये है,
जब चले थे बस एक तुम्हारा दिल था,
एक आखर जुबां पे था,
डेढ़ संझो के जेब में रखा था,
हाँ कुछ शुबों और शिखवो को कही भूल आये है
बस पूंजी के ब्याज पर होते है धुंआ
कुछ महफिलों सा माहोल भी दीखता है,
साकी के साथ रूह है, रूहदारी भी,
४ - ५ दोस्त है, उनकी किलकारी भी
वही अपना पूरा कारवां
अच्छा सुनो ...
जो दिखाया है देख पायी हो क्या
जो समझाया है समझ पायी हो क्या
नहीं ?
कोई बात नहीं !
लो ये चाय, अपने हाथों से बनायीं है
बदले में मुझे क्या चाहिए?
बस, तुम्हारी मद्धम सी मुस्कान।
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