Thursday, February 1, 2024

बाज़ार लगा है...

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Once I completed writing this and read it for the first time, it gave me vibes of 

a Nukkad-Natak. Try to read it in that tone, hopefully you will enjoy it.

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बाज़ार लगा है क्या बेचते हो - 

कुछ ने कहा, 

रोटी है, गोल गोल, गरम गरम,

खुद को तपा के पेट की ताप मिटाती है, श्रम मांगती है 

मोल दो ले जाओ, 

खुद खाओ, औरो को खिलाओ |


बाज़ार लगा है क्या बेचते हो - 

कुछ ने कहा, 

कला है, अद्भुत, मर्मस्पर्शी, 

साधना मांगती है, 

मोल दो ले जाओ,

खुद निहारो, बखान बघारो |


बाज़ार लगा है क्या बेचते हो - 

कुछ ने कहा, 

ज़मीर है, ज़रूरतें भरा, मजबूरी भरा,

लालच बढ़ाता है, फायदे करता है,

मोल दो ले जाओ,

और हाँ सो सको तो सो जाओ |


बाज़ार लगा है क्या बेचते हो - 

कुछ ने कहा, 

देह है, मखमल से भी, कर्कश से भी,

कुछ व्यापारियों के दिए है, कुछ खुशी ने दिए है,

ज्यादातर लाचारी ले कर आयी है,

आज की भूक-प्यास मिट जाएगी पर कल फिर लौट आएगी,

मोल दो ले जाओ,

खा-पी लो, कल फिर आना नहीं तो ये भूखे मर जायेंगे|


बाज़ार लगा है क्या बेचते हो - 

कुछ ने कहा, 

बुद्धि है, विशाल, अपार, शक्तिशाली,

तप मांगती है, संसार दिलाती है,

मोल दो ले जाओ,

खूब बाटना पर संभाल के रखना कही अहम् चुरा न ले|


बाज़ार लगा है पर ये क्या है जो बिक नहीं रहा - 

उस ने कहा, 

विवेक है, 

सबको लगता है की बिकाऊ है पर कोई मोल नहीं पाता, 

बस कुछ गिने चुने आते है और साथ ले जाते है|


सब ख़तम हो गया?

अरे पर बाज़ार तो अभी भी लगा है,

हाँ क्युकी ये अभी यही है, ये बिकना नहीं चाहते,

क्या है ये ?

मूर्खता, निःस्वार्थता, पागलपन और इनकी अगुआ "यारी",

जहां जाती है, तीनो को साथ ले जाती है,

बाज़ार को देखती है और खूब मज़ाक उड़ाती है,

आनंद उठाना हो तो इन चारो पे पीछे बैठ जाओ,

और नहीं तो बाकी सब तो है ही,

मोल दो और ले जाओ|

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