खून तो खौल रहा है, मेरे भाई की शहादत है
बेपरवाही पर गुस्सा भी है, क्यों न हो चुप्पी एक आदत सी है।
याद आरहा है उस आंगन का खेला जहां यू ही आपस में अड़ लिया करते,
अब बस मन करता है कि कुछ और सीढ़ियां चड लिया करते।
चीख अब दब नही पाएगी,
क्या मेरे यारो की ज़िंदगी मज़ाक बन के रह जायेगी।
अब तो लेन-देन और सियासती मुखोटों के ऊपर उठो सालो,
अपनी माँ के दर्द का चरम बीते बहुत हुए सालों।
याद में रह जायेगी बस हर बार की तरह कुछ मोमबत्तियां,
उन्ही मोमबत्तियों से अब मशालें जलालो।
कुछ नही उस हैवान की बिसात,
बस कुछ ही चाटों कि औक़ात।
मार कर बस अब खत्म करो,
खून से सराबोर ये उसकी धारा करो।
एक मुट्ठी रेत, बंदूको की सलामी, कुछ फूल और मेरा तिरंगा,
दहाड़ रहे है करो उन सिरफिरों को नंगा।
कब तक हुम जवाबी पलटवार करेंगे,
उनके बंदे पहले कब मरेंगे।
सत्तर साल हुए है, शायद छोटी बात लगती है,
पर मेरी लाखों माएं और बहने रोज़ खून के आंसू रोइ है।
उन आसुओं को पोछ तो सकते नही,
मान ही रख लो जो कुछ कर सकते नही।
किसके आगे रोऊ, उस शहादत की तौहीन हो जाएगी,
पहली गोली अब की बार मेरी और से चल जाएगी,
रुख हवा का बदलता नही दिख रहा,
मेरा दूसरा भाई अभी भी सोता दिख रहा।
मैं जगा नही पा रहा या वो जागना नही चाह रहा,
ओह याद आया कुछ ही महीनों में अगला चुनाव आरहा।
आर या पर की बात करो, बीच मझधार में मत लटकाओ,
मेरी भूलने की बीमारी को अपनी ढाल मत बनाओ।
जो हुआ कुछ खास नही है क्या, चालीस लाशों का बोझ कम नही है क्या।
फिर से कहता हूं के
खून तो खौल रहा है, मेरे भाई की शहादत है,
इंसानियत के लिए इस बार मत कहना के चुप रहना मेरी आदत है।
- एक हिदुस्तानी
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