सुबह का फलसफा, मेरे दिल कि आवाज़ ना पहचाने, ना ही मदहोश
श्यामों को रास मैं आऊँ….
पंख हवा के लालच दे मुझे कि साथ उड़ा ले जाएँ और मैं खुद
को चट्टानों का हाथ थामे भी पाऊँ…
रहना चहुँ सरज़ोर नदी पर और किनारे के मोह को छोड़ भी न पाऊँ…
सर्दियों से सीख लूँ मैं और गर्मियों को पी जाऊं…
रख दूँ ताख पर आसूं अपने पर कराह के रो भी जाऊं…
चाहू के खुश कर दू आज दिलों को और मैं ठहाका बन भी जाऊं…
दिलों को जीतना आदत बन जाए मेरी और किलों पे भी में झंडे लहराऊँ…
अक्स दिखूं मैं शानदार और बेहतरीन तस्वीर में बन ही जाऊं…
मुरझाउँ और खिल भी जाऊं…
सब्र के फल का मज़ा बेसब्री से उठाऊं…
उठ कर चला जाऊं और चल-चल कर मैं उठ जाऊं…
शुरू से शुरुआत करू अब और आखिरी पन्ना लिख पाऊँ…
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